बीईएल 10 हजार करोड की परियोजना के लिए चुनेगी कंसोर्टियम
Source : Rajesh Bhagtani | Jun 21, 2012

नई दिल्ली। रक्षा उपकरण क्षेत्र में लंबे समय के इंतजार के बाद निजी कंपनियों को भागीदारी देने के लिए रक्षा मंत्रालय ने निजी क्षेत्र के एक कंसोर्टियम को भाारत इलेक्ट्रानिक्स बीईएल के मुकाबले के लिए चुना है। इस कंसोर्टियम को 21 वीं सदी के युद्ध क्षेत्रों के लिए संचार नेटवर्क की रीढ तैयार करने के लिए लगभग 10,000 करोड रूपये की परियोजना दी गई है।
इस नेटवर्क को टीसीएस यानी टैक्निकल कम्युनिकेशंस सिस्टम कहा गया है। जिसे दो भारतीय डेवलपमेंट एजेंसियां मिलकर तैयार करेंगी। इसके लिए साउथ ब्लॉक ने बीईएल के अलावा निजी क्षेत्र के कंसोर्टियम को दूसरी ऎंजसी के रूप में चुना है जिसमें लार्सन ऎंड टुब्रो, टाटा पावर विशेष इलेक्ट्रानिक्स विभाग और एचसीएल शामिल है। रक्षा मंत्रालय ने गुरूवार को दोनों डेवलपमेंट एजेंसियों को इसकी लिखित सूचना दी है। टीसीएस एक मोबाइल संचार ग्रिड है जिससे सभी युद्ध क्षेत्रों को जोडा जाएगा। इसे दुश्मन के करीबी क्षेत्रों तक स्थापित किया जाएगा।
प्रत्येक फौजी दस्ते करीब 60,000 सिपाही को संचार के लिए जरूरी बैंडविड्थ फ्रीक्वेंसी, वॉयस, डेटा व वीडियो सुविधा के साथ एक टीसीएस उपलब्ध कराया जाएगा। हालांकि टीसीएस सेल्युलर फोन नेटवर्क की तरह काम करेगा, लेकिन दोनों में मुख्य रूप से 3 अंतर होंगे। पहला, टीसीएस मोबाइल होगा और इसके एक्सचेंज और स्विच भारी वाहनों में स्थापित किए जाएंगे ताकि इसे आसानी से पहाडों और रेगिस्तानों में कहीं भी ले जाया जा सके।
दूसरा, टीसीएस भारी मात्रा में डेटा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाएगा। जिसमें नक्शे, वीडियो कॉन्फ्रेसिंग या बिना चालक वाले वाहनों से वीडियो स्ट्रीमिंग शामिल हैं। तीसरा, टीसीएस के तहत गोपनीयता बरकरार रखा जाएगा और यह तेज फ्रीक्वेंसी के साथ दुश्मनों पर नजर रखेगा। इसकी तीव्रता एक सेंकड में सौ डेटा की होगी। गोपनीयता के महत्व को समझते हुए रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि टीसीएस को भारत में ही तैयार करना अनिवार्य है। यह रक्षा खरीद नीति 2008 (डीपीपी 2008)की मेक श्रेणी के तहत पहली परियोजना है।
इसमें उल्लेख किया गया है कि भारतीय कंपनी या कंसोर्टियम द्वारा शुरूआती चरण में कम से कम 30 फीसदी स्वदेशीकरण के साथ टीसीएस को विकसित किया जाएगा। परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट डीपीआर तैयार करने में दोनों डेवलपमेंट एजेंसियों को करीब 6 महीने का समय लगेगा। इसके तहत प्रत्येक प्रणाली, या उप प्रणाली और टीसीएस नेटवर्क की क्षमता को परिभाषित किया जाएगा। डीपीआर के अध्ययन के बाद रक्षा मंत्रालय टीसीएस प्रोटोटाइप के विकास पर लागत का आकलन करेगा। उद्योग सूत्रों का कहना है कि एक सैन्य टुकडी (15,000 सेना) के लिए टीसीएस प्रोटोटाइप पर लगभग 300 करोड रूपये की लागत आ सकती है। रक्षा मंत्रालय 80 फीसदी लागत का वहन करेगा जबकि शेष 20 फीसदी लागत वेंडरों को वहन करना होगा।